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इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणी पर विवाद, कानून विशेषज्ञों ने की निंदा

इलाहाबाद हाईकोर्ट की यौन अपराध से जुड़े एक मामले में की गई टिप्पणी की कानून विशेषज्ञों ने निंदा की है। हाईकोर्ट ने कहा कि निजी अंगों को पकड़ना और पायजामे का नाड़ा तोड़ना बलात्कार या बलात्कार के प्रयास की श्रेणी में नहीं आता। इस पर कपिल सिब्बल, पिंकी आनंद और विकास पाहवा जैसे दिग्गज वकीलों ने आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि ऐसी टिप्पणियां पीड़ितों के लिए न्याय पाने में बाधा बन सकती हैं और न्यायपालिका पर से भरोसा घटा सकती हैं।

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By Shraddha Singh | Delhi, Delhi | खबरें - 22 March 2025

यौन अपराध से जुड़े एक मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणी की कानून विशेषज्ञों ने शुक्रवार (22 मार्च, 2025) को निंदा की है। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि किसी लड़की के निजी अंग को पकड़ना और उसके पायजामे का नाड़ा तोड़ना बलात्कार या बलात्कार के प्रयास की श्रेणी में नहीं आता। इस फैसले को लेकर कई कानूनी विशेषज्ञों, वरिष्ठ अधिवक्ताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने कड़ी प्रतिक्रिया दी है।

फैसले पर उठे सवाल

सीनियर एडवोकेट और सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष कपिल सिब्बल ने इस फैसले की आलोचना करते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर लिखा, "भगवान ही इस देश को बचाए, क्योंकि पीठ में इस तरह के न्यायाधीश विराजमान हैं! सुप्रीम कोर्ट गलती करने वाले जजों से निपटने के मामले में बहुत नरम रहा है।"

उन्होंने यह भी कहा कि न्यायाधीशों, खासकर हाईकोर्ट के जजों को संवेदनशील मामलों में टिप्पणियां करने से बचना चाहिए क्योंकि इससे समाज में गलत संदेश जाता है और न्यायपालिका की साख पर भी असर पड़ता है।

कानूनी विशेषज्ञों का नजरिया

वरिष्ठ अधिवक्ता पिंकी आनंद ने इस फैसले पर सवाल उठाते हुए कहा कि, "मौजूदा दौर में, खासतौर पर सतीश बनाम महाराष्ट्र राज्य जैसे मामलों के बाद, इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला बलात्कार के प्रयास जैसे जघन्य अपराध को कमतर करके आंकता है, जो न्याय का उपहास है।"

उन्होंने आगे कहा कि लड़की के निजी अंगों को पकड़ना, उसके पायजामे का नाड़ा तोड़ना, उसे घसीटकर पुलिया के नीचे ले जाने की कोशिश करना और सिर्फ हस्तक्षेप के बाद ही भागने जैसे तथ्यों के मद्देनजर यह मामला पूरी तरह बलात्कार के प्रयास की श्रेणी में आता है।

सीनियर एडवोकेट विकास पाहवा ने भी इस फैसले को चिंताजनक बताते हुए कहा कि इससे यौन हिंसा के पीड़ितों की सुरक्षा को लेकर न्यायिक प्रणाली की प्रतिबद्धता पर जनता का विश्वास कमजोर हो सकता है। उन्होंने कहा, "ऐसे फैसले पीड़ितों को आगे आने से हतोत्साहित कर सकते हैं, क्योंकि उन्हें डर होगा कि उनके साथ हुई हरकतों को कमतर आंका जाएगा या खारिज कर दिया जाएगा।"

न्यायपालिका पर उठे सवाल

वरिष्ठ अधिवक्ता पी.के. दुबे ने कहा कि, "न्यायाधीशों को अपने निजी विचारों को अलग रखते हुए स्थापित कानून और न्यायशास्त्र का पालन करना चाहिए।" उन्होंने यह भी जोड़ा कि यौन अपराधों से जुड़े मामलों में इस बात पर विचार किया जाता है कि किसी भी रूप में यौन मंशा जाहिर हुई या नहीं, और पीड़िता को शारीरिक या मानसिक चोट पहुंची या नहीं।

मामले का बैकग्राउंड

यह मामला उत्तर प्रदेश के कासगंज जिले का है, जहां 2021 में 11 साल की एक लड़की पर दो लोगों ने हमला किया था। इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस राम मनोहर नारायण मिश्रा की बेंच ने इस मामले में फैसला सुनाते हुए कहा कि सिर्फ किसी के निजी अंगों को पकड़ना और पायजामे का नाड़ा तोड़ना बलात्कार के अपराध की श्रेणी में नहीं आता बल्कि इसे किसी महिला को निर्वस्त्र करने के इरादे से उस पर हमला करने या आपराधिक बल प्रयोग के दायरे में रखा जा सकता है।

न्यायपालिका की भूमिका पर चर्चा

इस फैसले के बाद देशभर में न्यायपालिका की भूमिका और यौन अपराधों पर कानून की व्याख्या को लेकर बहस छिड़ गई है।

कानून विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि, "बलात्कार के प्रयास को परिभाषित करने में अधिक स्पष्टता की आवश्यकता है, ताकि पीड़ितों को न्याय मिल सके और अपराधियों पर कठोर कार्रवाई हो।"

सीनियर एडवोकेट इंदिरा जयसिंह ने भी इस मुद्दे पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि, "हमारी न्यायिक प्रणाली को अधिक संवेदनशील और पीड़िता-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है।" उन्होंने यह भी जोड़ा कि संविधान और कानून की सही व्याख्या किए बिना इस तरह के फैसले समाज में गलत संदेश देते हैं।

क्या आगे होगा?

कानूनी विशेषज्ञों और कार्यकर्ताओं की मांग है कि सुप्रीम कोर्ट को इस फैसले पर संज्ञान लेना चाहिए और ऐसे मामलों में न्यायिक दृष्टिकोण को अधिक स्पष्ट और सख्त बनाया जाना चाहिए। साथ ही, यह सुनिश्चित किया जाए कि न्यायपालिका के फैसले समाज में गलत संदेश न दें और बलात्कार पीड़ितों को न्याय दिलाने में मददगार साबित हों।

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